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चीन आगे कैसे? भारत क्यों नहीं?

दो – चार दशकों में कोई विकासशील राष्ट्र इतना आगे कैसे बढ़ सकता है जबकि दुनिया के बड़े अर्थशास्त्री हमारे यहाँ प्रधानमंत्री बनते हों? और फिर, एक चरम वामपंथी देश द्वारा इतना विकास कैसे संभव है जबकि विकास का नारा रात-दिन हम दक्षिणपंथी यहाँ देते हैं?

The Long March: US-China Trade War (In Hindi)

दोनों के व्यापारिक हित इतने स्तरीय और अविश्वसनीय रुप से गुँथे हुए हैं कि दोनों का काम एक दूसरे के बग़ैर चल भी नहीं सकता। और यह भी एक कारण है कि दोनों देशों में वास्तविक युद्ध की कोई सम्भावना नहीं है। इस थ्योरी की पड़ताल बाद में। दरअसल ख़ुद विश्व समुदाय के लिए चीन और अमरीका दोनों अपरिहार्य हैं। 1990 में चीन की जीडीपी 11 वीं पोज़िशन पर थी ईरान और ब्राज़ील के भी पीछे। 2010 आते-आते वह अमरीका के बाद दूसरे नंबर पर पहुँच चुका है। ये कैसे हुआ इस पर भी चर्चा बाद में।

अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों के अध्ययन में प्रभुत्व के स्थायित्व की अवधारणा कितनी सटीक है?

सिर्फ एक प्रभुत्व – पूर्ण सत्ता के पास ही वह प्रेरक कारक और सामर्थ्य हो सकता है कि वह अंतराष्ट्रीय सुरक्षा, मुक्त व्यापार, विदेशी निवेश, अंतराष्ट्रीय मुद्रा, इत्यादि जैसे पब्लिक गुड्स की उपलब्धता सुनिश्चित कर सके और साथ ही दुष्ट या मुफ़्त की सवारी करने वाले राष्ट्रों पर लग़ाम लगा सके और उन्हें भी कीमत अदा करने को बाध्य कर सके।

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